रिपोर्टर - दीपक आनंद
नई दिल्ली
होप (HOPE) ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 'मिशन वात्सल्य' के तहत बाल संरक्षण समितियों पर राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट जारी की
नई दिल्ली — 22 सितंबर 2026 होप (HOPE) ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आधिकारिक तौर पर अपनी शोध अध्ययन रिपोर्ट "मिशन वात्सल्य के तहत ग्राम एवं ब्लॉक बाल संरक्षण समितियों का कार्यान्वयन" लॉन्च की।
इस रिपोर्ट का औपचारिक विमोचन श्री पी. जोसेफ विक्टर राज द्वारा किया गया। अध्ययन की शुरुआती प्रतियां प्रमुख नागरिक समाज के दिग्गजों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को भेंट की गईं, जिनमें श्री अशोक सिंह (राष्ट्रीय संयोजक, कैंपेन अगेंस्ट चाइल्ड लेबर), श्रीमती ईशानी त्रिपाठी (प्रवाह), और एडवोकेट जावेद चौधरी (द इंडियन लीगल एसोसिएट्स - TILA) शामिल थे।
औपचारिक अनावरण के बाद, श्री पी. जोसेफ विक्टर राज ने अध्ययन में संकलित कार्यप्रणाली, मात्रात्मक रुझान, संस्थागत मॉडल और प्रमुख सिफारिशों का सारांश देते हुए एक विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
अध्ययन विभिन्न भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मिशन वात्सल्य (पूर्व में एकीकृत बाल संरक्षण योजना - ICPS) के तहत गठित ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों (VLCPCs/VCPCs) और ब्लॉक स्तरीय बाल संरक्षण समितियों (BLCPCs/BCPCs) के गठन और परिचालन स्थिति का मूल्यांकन करता है:
जमीनी स्तर की तुलना में ब्लॉक-स्तरीय समितियों का गठन अधिक तेज:
कई राज्यों और जिलों में, ब्लॉक-स्तरीय निकायों (BLCPCs) की स्थापना ग्राम-स्तरीय निकायों (VLCPCs) की तुलना में अधिक तेजी से और निरंतरता के साथ की गई है।
मेघालय में सबसे बड़ा अंतर देखा गया है: ब्लॉक स्तरीय समितियों का कवरेज 98.11% (53 में से 52 ब्लॉक) है, जबकि ग्राम स्तरीय समितियों का कवरेज केवल 53.07% (7,705 में से 4,089 गांव) ही है, जिससे 3,616 असंगठित ग्राम समितियों का अंतर बना हुआ है।
बांदीपोरा (जम्मू और कश्मीर) और चंपावत (उत्तराखंड) में 100% ब्लॉक-स्तरीय कवरेज के साथ-साथ अधूरा ग्राम-स्तरीय गठन का समान रुझान दिखाई देता है।
उच्च प्रशासनिक कवरेज वाले क्षेत्र:
ब्लॉक और ग्राम दोनों स्तरों पर लगभग पूर्ण या शत-प्रतिशत कवरेज आंध्र प्रदेश (श्रीकाकुलम जिला: 712 ग्राम पंचायतें और 30 मंडल), गांदरबल (जम्मू-कश्मीर: 7 ब्लॉक और 126 गांवों में 100%), पश्चिम बंगाल (पश्चिम मेदिनीपुर और पश्चिम बर्धमान), गुजरात (अरावली, छोटाउदेपुर, दाहोद, जामनगर, जूनागढ़, महेसाणा, राजकोट और नर्मदा), केरल (कासरगोड और मलप्पुरम), और हिमाचल प्रदेश के परियोजना क्षेत्रों (फतेहपुर और रामपुर) में दर्ज किया गया है।
दो मुख्य संस्थागत कार्यान्वयन मॉडलों का उभरना:
स्वतंत्र (स्टैंडअलोन) मॉडल: औपचारिक, समर्पित ग्राम और ब्लॉक स्तरीय बाल संरक्षण समितियों को स्वतंत्र रूप से अधिसूचित किया जाता है (जैसे, पश्चिम बंगाल, गुजरात, श्रीकाकुलम, गांदरबल)। यह मॉडल स्पष्ट संस्थागत पहचान देता है, लेकिन प्रशासनिक स्तरों को बढ़ाने का जोखिम भी रखता है।
अभिसरण (कनवर्जेंस) मॉडल: बाल-संरक्षण के दायित्व पंचायती राज की मौजूदा स्थायी समितियों, जैसे स्वास्थ्य और कल्याण समितियों को सौंपे जाते हैं (जैसे, उत्तराखंड)। यह संस्थागत दोहराव से बचाता है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है कि व्यापक नागरिक कर्तव्यों के बीच बाल अधिकारों की उपेक्षा न हो।
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